“खामेनेई के बाद कौन? अराफी की एंट्री से तेहरान की सत्ता में नया अध्याय!”

शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों के बाद ईरान की सत्ता संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। देश के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की मौत की खबर के बाद तेहरान ने तेजी से नेतृत्व परिवर्तन का ऐलान किया।

ईरान ने वरिष्ठ धर्मगुरु Alireza Arafi को अंतरिम सुप्रीम लीडर नियुक्त किया है। ऐसे वक्त में जब देश बाहरी दबाव और आंतरिक अस्थिरता से जूझ रहा है, यह फैसला बेहद अहम माना जा रहा है।

कौन हैं अलीरेजा अराफी?

1959 में यज्द प्रांत के मेयबोद में जन्मे अराफी एक प्रतिष्ठित मौलवी परिवार से आते हैं। उनके पिता भी जाने-माने इस्लामी विद्वान थे। अराफी ने अपना अधिकांश जीवन कोम के धार्मिक संस्थानों में शिक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच बिताया।

कोम को शिया इस्लाम का बौद्धिक केंद्र माना जाता है, और यहीं से अराफी का प्रभाव धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचा।

‘मुजतहिद’ की पदवी और धार्मिक कद

अराफी ने कोम के वरिष्ठ उलेमाओं के मार्गदर्शन में उच्च धार्मिक शिक्षा हासिल की और ‘मुजतहिद’ की उपाधि प्राप्त की। शिया परंपरा में यह दर्जा उन्हें स्वतंत्र रूप से इस्लामी कानूनी व्याख्या करने का अधिकार देता है।

धार्मिक प्रतिष्ठा और संस्थागत अनुभव—यही कॉम्बिनेशन उन्हें सत्ता के इस अहम पड़ाव तक लेकर आया।

खामेनेई के करीबी, सिस्टम के भरोसेमंद

अराफी को खामेनेई का भरोसेमंद चेहरा माना जाता रहा है। उन्होंने मेयबोद और कोम में जुमे की नमाज की अगुवाई की जो ईरान की राजनीति में प्रतीकात्मक रूप से सत्ता की निकटता का संकेत है।

वे अल-मुस्तफा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के चेयरमैन भी रह चुके हैं, जो देश-विदेश के मौलवियों को ट्रेनिंग देती है। 2019 में उन्हें गार्जियन काउंसिल का सदस्य बनाया गया था वही संस्था जो संसद से पारित कानूनों की समीक्षा करती है और चुनावी उम्मीदवारों की जांच करती है।

साफ है, सिस्टम उन्हें जानता भी है और मानता भी है।

अराफी ही क्यों?

अराफी के पास प्रशासनिक अनुभव, धार्मिक वैधता और राजनीतिक वफादारी तीनों का संतुलन है। वे कट्टरपंथी खेमे से जुड़े माने जाते हैं और इस्लामिक गणराज्य की मौजूदा संरचना के समर्थक हैं।

संकट की घड़ी में ईरान को ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो “continuity” का संदेश दे सके। अराफी का चयन इसी रणनीति का हिस्सा समझा जा रहा है।

आगे की राह: सत्ता, संघर्ष और संतुलन

ईरान इस वक्त केवल सैन्य दबाव ही नहीं, बल्कि आर्थिक प्रतिबंधों और आंतरिक असंतोष से भी जूझ रहा है। ऐसे में नए अंतरिम सुप्रीम लीडर के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी सिस्टम को स्थिर रखना और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर रणनीतिक संतुलन बनाना।

सत्ता का शिखर जितना ऊंचा दिखता है, वहां हवा उतनी ही तेज चलती है। अराफी के लिए यह सिर्फ पद नहीं, बल्कि परीक्षा है।

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